—-कानून—-
निर्देशक: बी.आर.चोपड़ा
निर्माता: बी.आर.चोपड़ा
पटकथा लेखक: अख्तर उल रहमान, सी.जे.पावरी
कास्ट: अशोक कुमार, राजेन्द्र कुमार, महमूद और नंदा
वर्ष: 1960
समय: 139 मिनट
रेटिंग: 4/5
हमारे देश का कानून कहता है कि सौ मुलज़िम छूट जाएं, लेकिन किसी एक बेगुनाह को सज़ा ना हो। लेकिन, कई बार ऐसा होता है कि बेगुनाह को भी सज़ा हो जाती है। दुनिया में पता नहीं ऐसे कितने इंसान बेगुनाह होंगे, जिनके बारे में दुनिया को पता भी नहीं होगा कि वो बेगुनाह हैं। कई मामलों में हमने यह भी देखा है कि कोई इंसान बेगुनाह था और उसके बाबजूद वो 20 साल, 30 साल या 40 साल जेल काट लेने के बाद बेगुनाह साबित होता है और छूट जाता है। लेकिन, अपनी जिंदगी के 20 साल, 30 साल या 40 साल जो उसने जेल में काटे हैं उसकी भरपाई नहीं हो पाती। इन्हीं सब मुद्दों के बारे में बात करती हुई एक फिल्म ‘कानून’ 1960 में आई थी। फिल्म का निर्दशन बी. आर. चोपड़ा ने किया था। फिल्म में मुख्य किरदार में राजेंद्र कुमार, अशोक कुमार और नाना पालसिकर थे।
कहानी
फिल्म की कहानी की शुरुआत एक दृश्य के साथ होती है, जिसमें कालिदास नाम के आदमी को एक अन्य आदमी की मौत के लिए सज़ा होती है, जिसकी मौत की सज़ा के लिए उसे 10 साल पहले ही सज़ा हो चुकी थी। इस मुकदमे के बाद पूरे शहर में इस मामले की चर्चा होनी लगती है। फिल्म अपनी कहानी तब पकड़ती है जब जज बद्री प्रसाद (अशोक कुमार) शहर के बड़े व्यापारी धनीराम (ओमप्रकाश) की हत्या कर देते हैं। उनका होने वाला दामाद एडवोकेट कैलाश खन्ना (राजेन्द्र कुमार) उनको हत्या करते हुए देख लेता है। लेकिन, उसके बाद वहाँ चोरी करने आया कालिया ( नाना पालसिकर) मौके पर मिलता है और पुलिस उसको धनीराम की हत्या के लिए गिरफ्तार कर लेती है। मामला अदालत में पहुँचता है तो इस मामले के लिए जज खुद बद्री प्रसाद ही होते हैं। एडवोकेट कैलाश खन्ना ने जज बद्री प्रसाद को खून करते हुए देख लिया था। इसके चलते उनका जमीर जाग जाता है और इसी के चलते वो सरकारी वकील की नौकरी को छोड़कर बेगुनाह कालिया का केस लड़ते हैं। इसके बाद पूरी कहानी इस मामले के इर्द-गिर्द घूमती है और एडवोकेट कैलाश खन्ना बद्री प्रसाद को मुज़रिम और कालिया को बेगुनाह साबित कर देते हैं। लेकिन, अंत में एक लाश मिलती है तब पता चलता है कि कैलाश ने जिसे देखा था वो बद्रीप्रसाद नहीं बल्कि उनके जैसा दिखने वाला यही शख्स था और वो अपना गुनाह मरने से पहले कबूल लेता है।
फिल्म का केंद्र
फिल्म के केंद्र बिंदु की बात करें तो यह फिल्म हमारे देश की न्याय व्यवस्था से सवाल पूछती है। फिल्म में अगर असल कातिल न पकड़ा जाता तो बेगुनाह होते हुए भी जज बद्रीप्रसाद की मौत और अगर कैलाश का जमीर ना जागता तो कालिया की मौत हो जाती। तो फिर ऐसे में बेगुनाहों की मौत की जिम्मेदारी किसके सिर पर होगी? हमारे देश का कानून तो वही देखता है, जो उसको दिखाया जाता है, वह खुद तो मुजरिम को पकड़ने नहीं जाता। इंसाफ का दारोमदार तो सिर्फ गवाही पर है, लेकिन हालातों की वजह से कई बार गवाह गलत भी हो सकते हैं। कई बार किसी मजबूरी में या रिश्ते में बंधे होने के कारण भी गवाह गलत हो सकते हैं। इसलिए यह फिल्म कहती है कि किसी भी व्यक्ति की गवाही के आधार पर हम किसी व्यक्ति की जान नहीं ले सकते।
उपसंहार
फिल्म की कहानी इस तरह से लिखी गई है कि पूरी फिल्म के दौरान यह दर्शकों को बांधे रखती है। इसी के चलते 1962 के फिल्मफेयर पुरस्कार में इस फिल्म का नॉमिनेशन भी बेस्ट स्टोरी के लिया हुआ था। फिल्म में अभिनय की बात करें तो राजेन्द्र कुमार, अशोक कुमार और नाना पालसिकर ने अपना किरदार बहुत अच्छी तरह से निभाया। महमूद और नंदा ने भी ठीकठाक अभिनय किया है। नाना पालसिकर ने 1962 में फिल्मफेयर अवार्ड में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का भी अवार्ड जीता था। बी. आर. चोपड़ा ने बहुत अच्छी तरह से फिल्म का निर्देशन किया। इसी के चलते इन्हें निर्देशन का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिल्म को भी 1960 का सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
- अभय पांडेय