भारत में हिंदी प्रदेश की बात होती है तो उस सूची में मध्यप्रदेश का नाम भी आता है। लेकिन मध्यप्रदेश में हिंदी भाषा के बहुत सारे विविध रूप बोले जाते हैं। ये बोली हैं खड़ी बोली, ब्रज, बुंदेली, कन्नौजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी और बघेली। इस प्रकार मध्यप्रदेश की प्रमुख भाषाओं में से एक है बघेली।
बघेली भाषा की बात करें तो इस भाषा का प्रयोग बघेलखंड क्षेत्र में किया जाता है। बघेलखंड क्षेत्र में मध्यप्रदेश के कुछ जिले जैसे अनूपपुर, रीवा, सतना, शहडोल, सिधी, उमरिया और उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला और साथ ही पूर्वी इलाहाबाद का क्षेत्र आता है।
प्राचीनकाल से इस प्रदेश का वर्णन मिलता है। रामायण काल में बघेलखंड कौशलकान्त के अंतर्गत और महाभारत काल में यह मेकल और बिराट् नामक दो राज्यों में विभक्त था। 140 ई.पू. से लेकर 315 ई.पू तक यहाँ नाग वंश का शासन रहा है। इसके बाद गुप्त, सेंगर, कलचुरी, चंदेल आदि राजवंशों ने इस प्रदेश के अलग-अलग भागों में शासन किया। 12वीं तथा 13वीं शताब्दी में यहाँ पर गौंड़, भर आदि जातियों का शासन रहा। सम्वत् 1220 में अन्हलवाढ़ा पाटन के सोलंकी राजपूतो की शाखा के बघेल ने यहाँ के शासक को पराजित कर बघेल राजवंश की नींव डाली। तभी से इस क्षेत्र का नाम बघेलखंड पड़ा।
भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार, पश्चिमी हिन्दी की व्युत्पत्ति शौरसेनी, प्राकृत तथा अपभ्रंश से बिहारी भाषाओं की मागधी से तथा पूर्वी हिन्दी की अर्द्ध मागधी से मानी गई है। अपभ्रंश को जैन प्राकृत तथा जैन अपभ्रंश नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि जैन साहित्य का अधिकांश भाग इसी भाषा में है। शौरसेनी तथा मगधी प्राकृतों तथा अपभ्रंशो के मध्य स्थित होने के कारण अद्ध मगधी इन भाषाओं से अधिक प्रभावित थी। यही कारण है कि पूर्वी हिंदी का पश्चिमी हिन्दी और बिहारी भाषा समुदाय के साथ इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है। अवधी भाषा के बघेलखंड (मध्यप्रदेश) में प्रचलित होने के कारण इसका नाम बघेली पड़ा है। पहले के रीवा राज्य तथा अभी के रीवा नगर के नाम पर इस को रीबाई भाषा भी कहते हैं।
बघेलखंड के अतिरिक्त बघेली बोली रीवा के दक्षिण में स्थित नरडाला और मिर्जापुर जिले के दक्षिणी भाग में सोन नदी के आसपास भी बोली जाती है। साथ ही, यह भाषा जबलपुर के कुछ भागों में भी प्रयोग की जाती है जहाँ वह पूर्व की ओर बढ़ती हुई शनैः शनैः बुंदेली में मिल जाती है। बुंदेली भाषा का मिश्रित रूप उत्तरप्रदेश के फतेहपुर, बाँदा और हम्मीरपुर में भी प्रचलित है। अवधी और बघेली भाषा की विभाजक रेखा यमुना नदी मानी जा सकती है, जो फतेहपुर और बाँदा जिले से होती हुई प्रयागराज के पास गंगा में जा मिलती है। यह सीमा अधिक वैज्ञानिक भी नही है क्योंकि फतेहपुर में यमुना के उत्तरी किनारे पर 'तिरहारी' बोली जाती है, जिसमें बघेली का मिश्रण है। साथ ही, प्रयागराज के दक्षिण पूर्व की बोली को यद्यपि बघेली कहते हैं, तथापि उसमें अवधी तथा बघेली का समिश्रण है।
विशुद्ध बघेली का प्रयोग बघेलखंड के रीवा, नागौद, सुहावल, मैहर तथा कोटी में होता है। इस प्रदेश का क्षेत्रफल लगभग 12,000 वर्गमील है। रीवा की सीमा के पूर्व दक्षिण में कैमूर पर्वतमाला के उस ओर के आदिवासी भी बघेली बोलते हैं, जो मूल बघेली से बहुत कम भिन्न है। इसे गोंडी भाषा कहते हैं। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि गोंडी में क्रियापदों के रूप में बघेली की तरह नहीं बल्कि बिहारी के समान बनाये जाते हैं। परिनिष्ठित बघेली के बोलनेवालों की संख्या लगभग 12 लाख और गोंडी बोलनेवालों की संख्या लगभग 5 लाख है।
बघेली भाषा के प्रमुख कवि और साहित्यकारों की बार करें तो कुछ नाम प्रमुख हैं। प. हरिदास बघेली भाषा के कवि और साहित्यकार में सबसे प्रमुख कवि हैं। प. हरिदास बघेली के पहले कवि भी माने जाते हैं। प. हरिदास ने वैसे तो कोई कविताओं की पुस्तक तो नहीं लिखी लेकिन उनकी कविताएं तुकबंदी के रूप में सुनने को बघेलखंड में मिलती हैं। प. हरिदास की कविताओं के कुछ अंश इस प्रकार हैं-
आजु आय रखिहाई पूनू काल्ह होई खजुलइया।
हरिदास का खरिच चुका हइ सुलगी नही रसइया।।
काहू क गिरिगा अगरा पगरा काहू केर ओसार।
हरिदास का मुड़हर गिरिगा रोमय धरे कपार ।।
नज़ीउद्दीन सिद्दीकी 'उपमा'- इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं भजनाबली, बहारे-कजली और बेईमान परोसो। इनकी रचनाओं की बात करें तो इसमें भक्ति भावनाओं का उदार था। इनकी साहित्यिक भाषा सरल और सुबोध थी।
बैजनाथप्रसाद वैजू- बैजनाथप्रसाद वैजू की रचनाओं का संग्रह 'वैजू की सूफियों’ के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी रचनाओं की बात करेन तो इसमें ग्रामीण जीवन और ग्रामीण लोगों की भावनाओं का चित्रण किया गया है। इनकी साहित्यिक भाषा शुद्ध बघेली और भाषा शैली प्रभावमन है।
पं० गुरुरामप्यारे अग्निहोत्री- इनका जन्म 'करी (सतना) में हुआ। इन्होंने संस्कृत, पुरातत्व तथा इतिहास का विशेष अध्ययन किया है। विंध्य प्रदेश की सरकार ने इन्हें इनकी रचनाओं के लिए कई पुरस्कार दिए। इन्होंने लगभग 20 पुस्तकें लिखी। इनकी रचनाओं की बात करें तो इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं विंध्य- प्रदेश का इतिहास, सोहावल राज्य इतिहास, प्रलाप (कविता-संग्रह), रिमह ई बोली।
अभय पांडे